मुझ में थोड़ी सी जान अभी बाकी है - A POEM BY BROTHER

Hello Readers,

This time going to presenting an utlimate poem by my brother, Suraj.



मुझ में थोड़ी सी जान अभी बाकी है :-

मुझ में थोड़ी सी

जान अभी बाकी है।

इन सूनी आँखों में

कुछ आग अभी बाकी है।

ज़रा धीमी हैं हवाएं साँसों की

पर इरादों में

तूफ़ान अभी बाकी है।

मुझ में थोड़ी सी

जान अभी बाकी है।



बस थमने को है

दिल की धड़कनें

बुझने को है

अंगारे इन आँखों के

पर बेजान पंखों में

कुछ उड़ान अभी बाकी है।

मुझ में थोड़ी सी

जान अभी बाकी है।


जी भर के जिया हूँ

इस ज़िंदगी में

पल भर के लिए भी

ना रुका हूँ मैं

पूरे कर लिए हैं

सारे ख्वाब फिर भी

एक ख़्वाहिश

एक अरमान अभी बाकी है।

मुझ में थोड़ी सी

जान अभी बाकी है।



लाँघ दिए हैं

सारे पर्वत और शिखर

कर लिया है पार

सारा का सारा समंदर

और अभी तो नापी है

सिर्फ ज़मीन ही

पूरा का पूरा

खुला आसमान अभी बाकी है।

मुझ में थोड़ी सी

जान अभी बाकी है।



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